हर इंसान को जीवन में दो में से एक पीड़ा जरूर सहनी पड़ती है — या तो अनुशासन की पीड़ा या फिर पछतावे की पीड़ा। अनुशासन की पीड़ा सीमित होती है, लेकिन यह हमें सही दिशा में ले जाती है। समय पर उठना, मेहनत करना, इच्छाओं पर नियंत्रण रखना और अपने लक्ष्यों के प्रति लगातार प्रयास करना इसमें शामिल है। यह थोड़ी असुविधा जरूर देती है, पर आगे चलकर यही सफलता, संतोष और आत्मविश्वास का मार्ग बनती है। वहीं पछतावे की पीड़ा तब आती है जब हम आलस्य, टालमटोल या लापरवाही के कारण जीवन में आए मौकों को खो देते हैं। तब चाहकर भी कुछ नहीं किया जा सकता। इसलिए बेहतर यही है कि समय रहते अनुशासन को अपनाया जाए, ताकि जीवन में पछताना न पड़े।
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